स्वयं को परमार्थ कर

रात, बादल से निकल कर, चाँद ने टोका मुझे, “है क्यों इतना तू परेशां, कैसी है चिंता तुझे? क्यों तू एकाकीपने की ओट में लेटा रहे? क्यों तू अपनी वास्तविकता से पलट सोता रहे? क्यों विरह की बेला तुझको यूँ लगे विकराल है? जब तेरे समक्ष उज्जवल तेरा विश्व विशाल है, क्यों ज़रा सी चोट भी कर देती है विह्वल तुझे? क्यों भला अपनी ही रूह और अक्स से है डर तुझे? क्यों नहीं आता भला तू अपनी रूह के रु-ब-रु? क्यों नहीं बढ़ कर कभी उस अक्स को लेता तू छू? मैत्री कर ले रूह से और अक्स को अपना समझ, फिर तू देख

हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए

है जंग यहाँ फिर आज छिड़ी है रण भूमि फिर आज सजी अर्जुन ने अपना धनुष कसा तरकश को फिर बाणों से भरा इस बार भी भाई समक्ष खड़े अर्जुन के बाण प्रत्यक्ष अड़े अस्थिर मन फिर से सवाल करे “अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?” अर्जुन का पराक्रम है प्रबल बाणों का शौर्य हुआ न कम ‘पर भाई से कैसे करें ये रण?’ व्यग्र-अशांत है अब भी मन ‘मन को वश में अब कैसे करें? कर्म पर ही चित कैसे धरें?’ नैतिकता विचार विमूढ़ किये अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए? व्याकुल अर्जुन, आह्वान किये हर चर-अचर से एक मांग किये “अरे ढूंढो

यहाँ सब चलता है

यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। श्वेत जामा ओढ़े है विनाश, भू बिछी है निर्दोषों की लाश, अश्रु-क्रंदन में बहे उल्लास, ढेर हुआ बेबस विश्वास, न्याय बना मूरत है कबसे मना रहा अवकाश, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। सूख रहा निर्झर का पानी मलिन है हाय! निरीह जवानी तोड़ते हैं सब रीढ़ शरों के रिसता है बस लहू करों से हर क्षण हर पल बिखर रही है व्याकुल उर की हर आस, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। क्षुद्र क्लेश, है बंटता देश पुरखों का खंडित अवशेष उड़ गयी चिड़िया स्वर्ण पंख