स्मारक का गौरव

Updated: Mar 29, 2021



PC: Pratik Agarwal

प्रम्बनन के जीर्ण  (छवि: प्रतीक अग्रवाल)


टूटे-फूटे एक स्मारक ने घंटों की मुझसे बात । 

पिछले वर्षों के भूकंपों ने तोड़े थे उसके हाथ ॥ 

आया था कभी सौ वर्ष पूर्व एक मध्य रात्रि तूफ़ान ।  

खोया था तब सर स्मारक ने, बच गए पर उसके प्राण ॥ 

टूटा-फूटा जर-जर था देह, पर बुलंद उसकी आवाज़ । 

भूली-बिसरी संस्कृति का अब बस यही बचा था ताज ॥ 

एकाकी रूप, पर सबल स्वरुप, वो कहता रहा कहानी । 

गौरव से पूर्ण, निष्ठा सम्पूर्ण, वो पिछले युग का था प्राणी ॥ 

राजा ने कभी वर्षों देकर, थी गढ़ी उसकी हर प्रतिमा । 

सोचा था कि वो सुनाएगा मीलों उस राज्य की महिमा ॥ 

वास्तु का अद्भुत रूप था वो, थी शिल्पकला भी अनुपम ।  

वो सबल कृति, दर्शाता था समृद्धि मेधा का संगम ॥ 

वर्षों तक उसका प्रताप रहा, पर अंत हुआ एक शाम । 

जब राजा अपनी सेना संग हारा एक प्रमुख संग्राम ॥ 

लूटा स्मारक को जन-जन ने, तोड़ा था उसका प्रांगण । 

लूटा था उसका रंग रूप, किया तहस-नहस वो उपवन ॥


था छिद्र-छिद्र वो स्मारक, पर कण-कण था छलकता तेज ।

ताने सीना वो डटा रहा, क्या हुआ जो लुट गयी सेज ॥ 

प्रकृति ने भी फिर रूप बदल, चले अनेक ही चाल । 

हो गया था सारा अंग भंग, पर महिमा रही विशाल ॥ 

वो प्रौढ़ रूप, वैभव का दूत, बना संस्कृति की पहचान । 

अब गौण राज्य, बदला समाज, पर डटा रहा वो महान॥ 

स्मारक ने फिर कहा मुझसे कि मर जाते हैं प्राणी । 

पर हम जैसे सृजन उनके दोहराएं उनकी कहानी ॥ 

महिमा गाने को हुआ जन्म, है जीवन का यही अर्थ । 

जो कृति अहम में डूब गयी, हुआ उसका जीवन व्यर्थ ॥ 

गौरव के पथ पर चला नहीं, न कृत्य हुआ वो कृतार्थ । 

जो जन्म मरण से अबाध्य खड़ा, है बना वही परमार्थ ॥ 

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