top of page

मनोव्यथा

Updated: Mar 29, 2021


The_sun1-300x225

क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है? क्यूं नियति से बदलियाँ छटती नहीं हैं? हर दिशा झुलसी है अग्नि के प्रलय से क्यूं धरा पर कोपलें खिलती नहीं हैं?


जब भी बढ़ के छूना चाहूँ मैं हवा को हाथ एक कालिख में रंग के लौट आते, जब भी कर में बूंदों को मैं भरना चाहूँ विष के प्याले उँगलियों पर छलक जाते। प्यासे होठों पर कलि खिलती नहीं हैं क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है?


ना कहीं मुस्कान है ना आस दिखती हर तरफ आंधी की गहरी श्वास चलती, प्रकृति के रस को पल-पल हम निगलते हर घूँट में आंसुओं की धार बहती। क्यूं ध्येय में नर्मियां जगती नहीं हैं? क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है?


क्यूँ कुपित और रुष्ट मन है हमारा क्यूँ रूचि और इप्सा में खुद को डुबाये, रूप और रंग के भवन में खोया रहता जिव्हा के झूठे व्यसन में क्यूँ फंसाये। क्यूँ ह्रदय की वाणी कुछ कहती नहीं है? क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है?


जन्म में भी रुदन है सुनाई देती शापित शोकाकुल हमारे दिन हैं कटते, द्वेष की गलियों में एकाकी हैं चलते तृष्णा की वह्नि में हम हर क्षण हैं जलते। मर्म की छाया कहीं मिलती नहीं है क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है?


शोर हूँ मैं क्रोध हूँ अब, दर्द हूँ एक आह हूँ अब, चीख हूँ जो चीरती है कर्ण-शान्ति भेदती जब। क्यूँ अधर की ज्वाला अब बुझती नहीं हैं? क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है?


क्या करूँ कि रोक दूं अब? शत्रु का मुख भेद दूं अब, विस्मृत जो संवेदना है कैसे आच्छादित करूँ अब? क्यूँ करुण-ज्योत अब जलती नहीं है? क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है?

0 views0 comments

Recent Posts

See All
Post: Blog2_Post
bottom of page