top of page

बंद कमरे

Updated: Mar 29, 2021

बंद कमरों की ख़ामोशी में कुछ यूँ डूबे रहते हैं हम अब कि ज़िन्दगी की पुकार दरवाज़े पर ही जाती है दब


अपने अन्धकार में लुप्त रमे रहते हैं कुछ यूँ कर्कश धुन में की अनसुना कर जाते हैं ज़िन्दगी की चीख को भी सुन के


मौत अपना रंगमंच शान से सजाती है और कर्न्पतालों तक आस की गुहार तक न पहुँचती है


ज़िन्दगी की खून से लथपथ दरवाज़े मृत्यु का रचाया खेल देखते रहते हैं और चादरों में छिपे हम उसके अंत की प्रतीक्षा करते रहते हैं


क्यूँ छिपाए बैठे हैं हम खुद को बंद कमरों की निर्जीव दीवारों में? जब तोड़ रही होती हैं ज़िन्दगी अपना दम उलझी, लिपटी, चीख पुकारों से


कब तक हारेगी ज़िन्दगी हमारे दरवाज़े पर आकर? कब तक छपेंगे हम भी काल की भव्यता से डर कर?


क्यों नहीं खोल देते हैं हम दरवाज़े और देते हैं एक मौका ज़िन्दगी को जीने का? क्यों नहीं चीर देते हैं हम ये चादर और जगने देते हैं अपने अन्दर भाव मानवता का?


अब नहीं तो कब बढ़ाएंगे हम अपने हाथ उस ज़िन्दगी की ओर ? आज नहीं, कल, दरवाज़े के उस तरफ होगी फँसी अपनी भी ज़िन्दगी की डोर


आ गया है वक्त अब ये दरवाज़े तोड़ देने का मौत के रसातल से निकल कर ज़िन्दगी के हाथ थाम लेने का


आ गया है वक्त अब अपने अन्दर सहमे हुए उस मानव को जगाने का अपनी बंदिशें तोड़ कर हर ज़िन्दगी को गले लगाने का


1 view0 comments

Recent Posts

See All

תגובות


Post: Blog2_Post
bottom of page