स्वरूप

मैं जब भी देखूँ दर्पण में, कुछ बदल रहा मेरे आँगन में। ये स्वरूप मेरा है या रूप तेरा, मैं सोच रही मन ही मन में।। चादर की सफेदी में अपने, है लगा मुझे भी तू ढकने। एक परत चढ़ी मेरे तन में, कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।। है धुआँ धुआँ फैला नभ में, आंधी है खड़ी सागर तट पे। न नियंत्रण है अब किसी कण में, कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।। आकृतियों से सज्जित प्रांगण है, विकृतियाँ भी मनभावन हैं। परिवर्तन है अंतर्मन में, कुछ बदल रहा मेरे आँगन में।। #hindipoems #winter #HindiPoetry #Reflections #glob

ठण्ड की कहानी

यूँ तो हर मौसम की अपनी मनमानी होती है, पर ठण्ड की एक दिलचस्प ही कहानी होती है। धुंध से भीगी रातें तो रूमानी होतीं हैं, पर दिसंबर में सर्दी दंतकड़कड़ानी होती है॥ ठण्ड अपनी चादर हर ओर कुछ ऐसे फैलाता है, नाड़ी का खून enzyme नहीं, तापमान जमाता है। गर्मी की deficiency में रोज़ कौन नाहता है, यह जान कर deodorant मन ही मन इतराता है ॥ सर्दी अपने प्रस्ताव से हमारी हैरानी उकसाती है , इस मौसम में आँसू हमारी नाक बहाती हैं, ठण्ड से कांपते कदमों को आग की गर्मी जमाती है रजाई refugee camp सी नज़र