Mirage

I think you still exist Or, do you, actually, not? As image you persist Reality says, you do not. You build me, every night, Story of colorful dream Daylight fades the colors Shredded bits scream In receding light of day, I weave from those shreds Fabricate a picture of you With the broken threads It comes alive at times Speaks to me at lengths Colors my dreams again Glues my weakening strengths Your image is my reality As real as it can be You dwell in my present And say, y

That silent guitar

Silently, it lays. Strings out of tune. Nothing brings life, Neither sun, nor moon. Skin has lost luster, Lies yellow and pale Crawlers adorn the gaps leaving tiny trails. Discordant, it lays. Its melody is gone. Yet the string’s might wait for the dawn. Silence is relentless. This wait is endless. For touch of those fingers, for warmth of that caress. Dusted and dying , Lay music inside. With broken hopes, it laid, when last night it cried. #music #poem #guitar #introspectio

अहम्

हरी-हरी ज़मीन से ऊँची शाख ने कहा, “मैं तना विशाल-सा, शान से यहाँ अड़ा, तुच्छ, तू ज़मीन पर, धूलग्रस्त है गड़ा, क्या महान कर रहा, तू वहाँ पड़ा-पड़ा? हूँ उगा मैं मिट्टी से, फिर भी नभ को चूमता, वर्षा की झंकार सुन, मदमस्त हो के झूमता, वन के पृष्ठ पर हरे रत्न-सा मैं हूँ जड़ा, क्या महान कर रहा तू वहाँ पड़ा-पड़ा? पक्षियों के नीड़ को थाम अपनी बांह में, कर रहा मैं तृप्त सबको, जो भी आये छाँह में, हर लता मुझसे लिपट, लगती जैसे अप्सरा, क्या महान कर रहा तू वहाँ पड़ा-पड़ा? मैं तरु प्रशस्त हूँ, स्वच्छ हव

हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए

है जंग यहाँ फिर आज छिड़ी है रण भूमि फिर आज सजी अर्जुन ने अपना धनुष कसा तरकश को फिर बाणों से भरा इस बार भी भाई समक्ष खड़े अर्जुन के बाण प्रत्यक्ष अड़े अस्थिर मन फिर से सवाल करे “अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?” अर्जुन का पराक्रम है प्रबल बाणों का शौर्य हुआ न कम ‘पर भाई से कैसे करें ये रण?’ व्यग्र-अशांत है अब भी मन ‘मन को वश में अब कैसे करें? कर्म पर ही चित कैसे धरें?’ नैतिकता विचार विमूढ़ किये अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए? व्याकुल अर्जुन, आह्वान किये हर चर-अचर से एक मांग किये “अरे ढूंढो

यहाँ सब चलता है

यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। श्वेत जामा ओढ़े है विनाश, भू बिछी है निर्दोषों की लाश, अश्रु-क्रंदन में बहे उल्लास, ढेर हुआ बेबस विश्वास, न्याय बना मूरत है कबसे मना रहा अवकाश, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। सूख रहा निर्झर का पानी मलिन है हाय! निरीह जवानी तोड़ते हैं सब रीढ़ शरों के रिसता है बस लहू करों से हर क्षण हर पल बिखर रही है व्याकुल उर की हर आस, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। क्षुद्र क्लेश, है बंटता देश पुरखों का खंडित अवशेष उड़ गयी चिड़िया स्वर्ण पंख

आलिंगन

अधखुली तेरी आँखों में लिखे थे अधूरे शब्द स्वयं को बांधे हुए थी मैं संकुचित, निस्तब्ध। तरंगों की आंधी में खिंच रहे थे अधीर मन भावों के भंवर से घिरे थे, हम आत्म-संलग्न। पवन-बयार संग थी जगमग चांदनी मद्धम साँसों की लय पर थिरकती वाहिनी थम-थम। उँगलियों की नर्मी से थे अभिभूत दो ह्रदय डोलते क़दमों से छिड़ा निर्बाध प्रेम-विषय। हर क्षण ने जोड़ा था ईंट झिझक के उस पार होठों का वो स्पर्श और उसमें मिश्रित प्यार। स्नेहिल भावों में हुआ था लुप्त ये संसार प्रेमालिंगन से सुलझा, उलझा हर विचार। बीत

ज्वलित बन तू

सूक्ष्म सी चिंगारी बन तू टिमटिमा जुगनू के संग संग। ज्वाला का सामर्थ्य रख तू अपने भीतर, अपने कण-कण॥ नम्रता की लौ भी बन तू जलती-बुझती, कम्पित अंग-अंग। सौम्य ज्योत हर ओर भर तू रात्रि की कालिख में रोशन॥ प्रेरणा की अग्नि बन तू ज्वलित कर धरती का प्रांगन। आज अब कुछ ऐसे जल तू प्रबुद्ध हो हर मन का आँगन॥ #Inspiration #hindi #ndi #motivation #poetry #poem #हिन्दी #कविता

बारिश की बूंदे

खिड़की से अन्दर आती वो बूंदे बारिश की कहती हैं कहानी सूरज के खिलाफ की साजिश की। मेघों से बिछड़ने का दुःख तो है उनमें, पर संतुष्टि भी है धरती से मिलन की सबमें॥ गगन से धरा तक की इस राह में, भूमि से मिलन की अतृप्त चाह में, बादल के कवच पहन सूरज से छिपते हुए, एक नयी स्फूर्ति पाई थी बूंदों ने गिरते हुए॥ नयी कोई ताल है उनकी इस तड़पन में, एक नया सुर है बूंदों की थिरकन में। मधुर नए बोल हैं उनके गिरने की आवाज़ में तार नए जोड़े हो जैसे पुराने टूटे साज़ में॥ धरती से मिलन की सुगंध में बूँदें सु

Tissue paper और कलम

उस रात बादलों के घेरे में यूँही अकेले चलते चलते। आया एक Tissue Paper कहीं से अचानक उड़ते उड़ते॥ कुछ अधूरे शब्द काली स्याही से लिखे हुए। धूलधूसरित कागज़ वो किनारे ज़रा फटे हुए॥ दिखता ना था कोई उस सूनसान राह पर। फ़ेंका था किसी ने इस tissue को जहां पर॥ जेब में डाल कर वो tissue घर की ओर मैं बढ़ी। कुछ दूर चौराहे पर एक टूटी कलम भी थी पड़ी॥ असमंजस में था मेरा मन क्या हुआ इन दोनों संग। किसने ऐसे बर्ताव किया किसने बिखेरा ये काला रंग॥ पढने की जो कोशिश की उन टूटे अक्षरों को। जोड़ ना सकी मैं पान