हे प्रिय!

हे प्रिय! पकड़ लो हाथ कभी मैं भी दो क्षण फिर साथ चलूँ। जो स्वप्न मौन में आहट दें उनका नयनों से स्पर्श करूँ॥ हे प्रिय! राग बन मिलो कभी तेरी ताल पे मैं नित नृत्य करूँ। जो स्वर वर्षों से अधूरे हैं कर पूर्ण उन्हें, नए गीत लिखूं॥ हे प्रिय! रंग सा बिखरो कभी मैं इंद्रधनुष नभ में गढ़ दूँ। तारों की झिलमिल चमक चुरा हर रात्रि मैं मोदित कर दूँ॥ हे प्रिय! शब्द बन बहो कभी मैं स्मृतियों को नयी भाषा दूँ। तेरे मृदुल संग के शीत तले कभी मैं फिसलूँ, तो कभी सम्भलूँ॥ हे प्रिय! कभी रुक, मेरा नाम तो ल

आलिंगन

अधखुली तेरी आँखों में लिखे थे अधूरे शब्द स्वयं को बांधे हुए थी मैं संकुचित, निस्तब्ध। तरंगों की आंधी में खिंच रहे थे अधीर मन भावों के भंवर से घिरे थे, हम आत्म-संलग्न। पवन-बयार संग थी जगमग चांदनी मद्धम साँसों की लय पर थिरकती वाहिनी थम-थम। उँगलियों की नर्मी से थे अभिभूत दो ह्रदय डोलते क़दमों से छिड़ा निर्बाध प्रेम-विषय। हर क्षण ने जोड़ा था ईंट झिझक के उस पार होठों का वो स्पर्श और उसमें मिश्रित प्यार। स्नेहिल भावों में हुआ था लुप्त ये संसार प्रेमालिंगन से सुलझा, उलझा हर विचार। बीत