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भूल जाओ मुझे

भूल जाओ मुझे, क्यूँ मेरे लाश को बार बार जगाते हो? क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो? मेरे साथ ही तो उस सभ्यता का अंत हो गया था...

स्वरूप

मैं जब भी देखूँ दर्पण में, कुछ बदल रहा मेरे आँगन में। ये स्वरूप मेरा है या रूप तेरा, मैं सोच रही मन ही मन में।। चादर की सफेदी में अपने,...

कल्पना की दुनिया

यथार्थ की परत के परोक्ष में, कल्पना की ओट के तले, एक अनोखी सी दुनिया प्रेरित, अबाध्य है पले। चेतन बोध से युक्त सृजन के सूत्रधारों की,...

चल, उचक, चंदा पकड़ लें

पक चली उस कल्पना को रंग-यौवन-रूप फिर दें । संकुचित उस सोच के पंखों में फिर से जान भर दें । तर्क के बंधन से उठ कर बचपने का स्वाद चख लें ।...

मैं आस की चादर बुनती थी

चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस जब चाँद छुपा था बादल में, था लिप्त गगन के आँगन में, मैं रात की चादर को ओढ़े तारों से बातें करती थी । मैं नभ के...

ये लहरें किधर हैं जाती?

डूब रहा है सूरज और गोधूलि हुई है बेला, बादल के सिरहाने पर किरणों का लगा है मेला । ऐसे में ये चंचल लहरें छोड़ के अपने घर को, बेसुध हो,...

बेटी घर आयी है

देखो आया अवसर पावन, स्नेह-विभोर घर का जन-जन, हर्षित उमंग जागा हर मन, आशीष छलकता है कण-कण, नवज्योत घर पर छाई है, देखो! बेटी घर आयी है। ओढ़े...

करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन

पृष्ठभूमि : अभिमन्यु चक्रव्यूह के आखिरी चरण में हैं। वे खुद को ये समझा रहे हैं कि अंतिम चरण की लड़ाई कैसे उनके कौशल पर निर्भर करती है ।...

आलिंगन

अधखुली तेरी आँखों में लिखे थे अधूरे शब्द स्वयं को बांधे हुए थी मैं संकुचित, निस्तब्ध। तरंगों की आंधी में खिंच रहे थे अधीर मन भावों के...

ऊंची नाक वाले अंकल

कल शाम मिले मुझे एक अंकल बहुत ही ऊंची नाक थी उनकी। कपडे थोड़े फटे हुए थे तनी हुई पर शाख थी उनकी॥ जब जहां जब भी वो जाते पहले उनकी नाक...

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