शिखरों के पार

हृदय को अकुलाता ये विचार है, दृष्टि को रोके जो ये पहाड़ है, बसता क्या शिखरों के उस पार है। उठती अब तल से चीख पुकार है, करती जो अंतः में चिंघाड़ है, छुपा क्या शिखरों के उस पार है। हृदय को नहीं ये स्वीकार है, क्यों यहाँ बंधा तेरा संसार है , जाने क्या शिखरों के उस पार है। तोड़ो, रोकती जो तुमको दीवार है, भू पर धरोहर का अंबार है, देखो क्या शिखरों के उस पार है।। #Inspiration #hindi #Blog #HindiPoetry #motivation #writings #Reflections #poetry #France #Thoughts #Annecy #Writing

शब्दों का हठ

कहते हैं मुझसे कि एक बच्चे की है स्वप्न से बनना, जो पक्षियों के पैरों में छुपकर घोंसले बना लेते हैं। कहते हैं मुझसे कि एक थिरकती लौ की आस सा बनना, जो उजड़ती साँसों को भी हौसला देकर जगा देते हैं। कविताओं के छंद बना जब पतंग सा मैंने उड़ाना चाहा, तो इनमें से कुछ आप ही बिखर गए धागे से खुलकर। पद्य के रस में पीस कर जब इत्र से मैंने फैलाना चाहा, तो इनमें से कुछ स्वयं ही लुप्त हुए बादल में घुलकर। अब उन्हें न ही किसी श्लोक न किसी आयत में बंद होना है, अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की परिभाषा

अरण्य का फूल

बेलों लताओं और डालियों पर सजते हैं कितने, रूप रंग सुरभि से शोभित कोमल हैं ये उतने। असंख्य खिलते हैं यहाँ और असंख्य मुरझाते हैं, अज्ञात और अविदित कितने धूल में मिल जाते हैं। दो दिन की ख्याति है कुछ की दो दिन पूजे जाते, फिर कोई न पूछे उन्हें जो वक्ष पर मुरझा जाते। जग रमता उसी को है जो फल का रूप है धरता, अरण्य का वो फूल मूल जो पेट किसी का भरता।। #random #Inspiration #hindi #HindiPoetry #Poems #writings #Reflections #poetry #Thoughts #Writing

काव्य नहीं बंधते

शब्द तो गट्ठर में कितने बांध रखे हैं, स्याही में घुल कलम से वो अब नहीं बहते। हो तरंगित कागज़ों को वो नहीं रंगते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। बीज तो माटी में निज विलीन होते हैं, किन्तु उनसे लय के अब अंकुर नहीं खिलते। मनस की बेलों पर नव सुमन नहीं सजते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। मैं पुराने ऊन को फिर उधेड़ बिनती हूँ, पर हठी ये गाँठ हाथों से नहीं खुलते। उलझ खुद में वो नए ढांचे नहीं ढलते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। अंतः में अटखेलियाँ तो भा

बढ़ चलें हैं कदम फिर से

छोड़ कर वो घर पुराना, ढूंढें न कोई ठिकाना, बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना। ऊंचाई कहाँ हैं जानते, मंज़िल नहीं हैं मानते। डर जो कभी रोके इन्हें उत्साह का कर हैं थामते। कौतुहल की डोर पर जीवन के पथ को है बढ़ाना। बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना।। काँधे पर बस्ता हैं डाले, दिल में रिश्तों को है पाले। थक चुके हैं, पक चुके हैं, फिर भी पग-पग हैं संभाले। खुशियों की है खोज कि यात्रा तो बस अब है बहाना। बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना।। जो पुरानी सभ्यता है छोड़ कर पीछे

ये लहरें किधर हैं जाती?

डूब रहा है सूरज और गोधूलि हुई है बेला, बादल के सिरहाने पर किरणों का लगा है मेला । ऐसे में ये चंचल लहरें छोड़ के अपने घर को, बेसुध हो, बेसब्र वो सारी, जाने चली किधर को ! नील से गहराता है गगन और चन्द्र का चढ़ता यौवन, श्वेत रश्मि से प्रज्ज्वल है तारों से सज्ज ये उपवन। शीतलता की छाँव में भी वो बांधे हुए हैं कर को, बेसुध हो, बेसब्र वो सारी, जाने चली किधर को ! समा के सारे नील गगन को अपने उर के अंदर, क्षितिज से भेंट हुई तो समझें खुद को सभी सिकंदर ! वक्त नहीं कि रुके किनारे साराह सकें

अहम्

हरी-हरी ज़मीन से ऊँची शाख ने कहा, “मैं तना विशाल-सा, शान से यहाँ अड़ा, तुच्छ, तू ज़मीन पर, धूलग्रस्त है गड़ा, क्या महान कर रहा, तू वहाँ पड़ा-पड़ा? हूँ उगा मैं मिट्टी से, फिर भी नभ को चूमता, वर्षा की झंकार सुन, मदमस्त हो के झूमता, वन के पृष्ठ पर हरे रत्न-सा मैं हूँ जड़ा, क्या महान कर रहा तू वहाँ पड़ा-पड़ा? पक्षियों के नीड़ को थाम अपनी बांह में, कर रहा मैं तृप्त सबको, जो भी आये छाँह में, हर लता मुझसे लिपट, लगती जैसे अप्सरा, क्या महान कर रहा तू वहाँ पड़ा-पड़ा? मैं तरु प्रशस्त हूँ, स्वच्छ हव

हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए

है जंग यहाँ फिर आज छिड़ी है रण भूमि फिर आज सजी अर्जुन ने अपना धनुष कसा तरकश को फिर बाणों से भरा इस बार भी भाई समक्ष खड़े अर्जुन के बाण प्रत्यक्ष अड़े अस्थिर मन फिर से सवाल करे “अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?” अर्जुन का पराक्रम है प्रबल बाणों का शौर्य हुआ न कम ‘पर भाई से कैसे करें ये रण?’ व्यग्र-अशांत है अब भी मन ‘मन को वश में अब कैसे करें? कर्म पर ही चित कैसे धरें?’ नैतिकता विचार विमूढ़ किये अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए? व्याकुल अर्जुन, आह्वान किये हर चर-अचर से एक मांग किये “अरे ढूंढो

यहाँ सब चलता है

यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। श्वेत जामा ओढ़े है विनाश, भू बिछी है निर्दोषों की लाश, अश्रु-क्रंदन में बहे उल्लास, ढेर हुआ बेबस विश्वास, न्याय बना मूरत है कबसे मना रहा अवकाश, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। सूख रहा निर्झर का पानी मलिन है हाय! निरीह जवानी तोड़ते हैं सब रीढ़ शरों के रिसता है बस लहू करों से हर क्षण हर पल बिखर रही है व्याकुल उर की हर आस, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। क्षुद्र क्लेश, है बंटता देश पुरखों का खंडित अवशेष उड़ गयी चिड़िया स्वर्ण पंख

आलिंगन

अधखुली तेरी आँखों में लिखे थे अधूरे शब्द स्वयं को बांधे हुए थी मैं संकुचित, निस्तब्ध। तरंगों की आंधी में खिंच रहे थे अधीर मन भावों के भंवर से घिरे थे, हम आत्म-संलग्न। पवन-बयार संग थी जगमग चांदनी मद्धम साँसों की लय पर थिरकती वाहिनी थम-थम। उँगलियों की नर्मी से थे अभिभूत दो ह्रदय डोलते क़दमों से छिड़ा निर्बाध प्रेम-विषय। हर क्षण ने जोड़ा था ईंट झिझक के उस पार होठों का वो स्पर्श और उसमें मिश्रित प्यार। स्नेहिल भावों में हुआ था लुप्त ये संसार प्रेमालिंगन से सुलझा, उलझा हर विचार। बीत

ज्वलित बन तू

सूक्ष्म सी चिंगारी बन तू टिमटिमा जुगनू के संग संग। ज्वाला का सामर्थ्य रख तू अपने भीतर, अपने कण-कण॥ नम्रता की लौ भी बन तू जलती-बुझती, कम्पित अंग-अंग। सौम्य ज्योत हर ओर भर तू रात्रि की कालिख में रोशन॥ प्रेरणा की अग्नि बन तू ज्वलित कर धरती का प्रांगन। आज अब कुछ ऐसे जल तू प्रबुद्ध हो हर मन का आँगन॥ #Inspiration #hindi #ndi #motivation #poetry #poem #हिन्दी #कविता

उठ जाग ! ऐ भारतीय !

Photo Courtesy Pratik Agarwal उत्तेजना संदेह से कुंठित हैं मनोभाव मिलती नही इस धूप से अब कहीं भी छाँव। हर अंग पर चिन्हित हुआ है भ्रष्ट का सवाल आता नहीं है मन में कोई अब दूसरा ख्याल॥ नीतियों में है कहीं फंसा वो राष्ट्रवाद विकास को रोके हुए, हर ओर का विवाद। ओढ़े हुए हैं मैली कुचली संस्कृति फटी आत्मदाह में जल रही किसानों की ये मिट्टी॥ धर्म की निरपेक्षता के नारे लगाते हम घर में ही अपने जाति पर लाशें बिछाते हम। उलझे हुए हैं चमडों के रंगों में वर्षों से कहने को तो सब हैं एक पर भिन्न

चल पड़ा सन्यासी वो

चल पड़ा सन्यासी वो, अपनी ही एक राह पर तलवे को नग्न कर और भूत को स्याह कर। बढ़ चला वो अपने पग से मार्ग को तराशता आज बस उम्मीदें ही बन रही उसका रास्ता॥ जरुरत का सामान कुछ, काँधे पे अपने डाल कर लक्ष्य की चाहत में है, स्वयं को संभाल कर। चल रहे हैं कदम उसके कंकडों को चूमते कीचड से लथपथ हैं पूरे, अपने धुन में झूमते॥ राहें अब उसकी बनी हैं, वो एक पथिक है बस सराहती उद्यम है उसका धुंध भी बरस-बरस। घास में नरमी है छाई मिट्टी गर्मी दे रही वादियाँ भी उसके इस आहट से प्रेरित हो रही॥ अर्पित

करूँ मैं किसकी आस?

दोषयुक्त है बगिया सारी विष का हुआ है वास सोच रहे हैं भँवरे सारे करूँ मैं किसकी आस? छोड़ गए परिजन हैं सारे ना ज्योत, ना विलास सोच रहे हैं वृद्धा सारे करूँ मैं किसकी आस? है विरक्त सशक्त समाज और करे ना कोई प्रयास सोच रहे हैं दुर्बल सारे करूँ मैं किसकी आस? सियासतों की लगती बाज़ी क्षतिग्रस्त विश्वास सोच रही है जनता सारी करूँ मैं किसकी आस? कंस मंथरा शकुनि बने सब लूट रहे हस्तिनापुर गोकुल जल रहा अयोध्या का आँचल मथुरा में भी है त्रास सोच रही है प्रजा बेचारी करूँ मैं किसकी आस? आस विलास व

बारिश की बूंदे

खिड़की से अन्दर आती वो बूंदे बारिश की कहती हैं कहानी सूरज के खिलाफ की साजिश की। मेघों से बिछड़ने का दुःख तो है उनमें, पर संतुष्टि भी है धरती से मिलन की सबमें॥ गगन से धरा तक की इस राह में, भूमि से मिलन की अतृप्त चाह में, बादल के कवच पहन सूरज से छिपते हुए, एक नयी स्फूर्ति पाई थी बूंदों ने गिरते हुए॥ नयी कोई ताल है उनकी इस तड़पन में, एक नया सुर है बूंदों की थिरकन में। मधुर नए बोल हैं उनके गिरने की आवाज़ में तार नए जोड़े हो जैसे पुराने टूटे साज़ में॥ धरती से मिलन की सुगंध में बूँदें सु