दीवारें

माना कि थे वो ग़लत और क्रूर अपरम्पार थे । दोषों से वो युक्त थे और पाप के भरमार थे ।। किन्तु दीवारें बना, क्या हमने हत्याएं न कीं? जो हमारे कर हुई, वो न्याय कैसे कब हुईं? क्या दीवारें बनने से आयी कभी कहीं शांति है? भूत के पन्ने पलट लो, इनसे हुई बस क्रांति है! #HindiPoetry #BerlinWall #Poems #FallofBerlinWall #Randomthoughts #Thoughts #Berlin #Germany #Writing

It lived for a day

He groomed it with wonders of love and spades, It bloomed, it flowered with yellow as shades. It was loved, it flourished It glowed, it was cherished. It passed, it swayed, from hand to hand Flaunting its beauty, with whispers of demand. And now, fractured, it lies, in a corner Spine fragmented and no beauty armour. Ephemeral was fragrance, scattered is softness Breathing the last, aloof and thoughtless It wilted in water, unuttered, astray It bloomed, it flourished, it lived

नाम से पहचान

Graphic courtesy: The Times of India एक रोज़ मुझे एक चिट्टी आयी, ‘सालों से तूने, न शक्ल दिखाई, आकर मिलो इस दफ्तर से तुम, साथ में लाना चंदन कुमकुम।’ पहचान पत्र ले जो मैं पहुंची, अफसर ने देखा, ली एक हिचकी, कहा, ‘नाम तेरा पसंद न आया आज से तू कहलायी माया।’ मैंने फिर आपत्ति जताई, ‘ये कौन सा नियम, मेरे भाई?’ ‘नियम? ये कौन सी है चिड़िया? भावना के बल चले है दुनिया।’ ‘भावना आपकी पर जीवन मेरा, नाम बदलना कठिन है फेरा। बदलना होगा हर दफ्तर में, घिसेंगे जूते इस चक्कर में।’ ‘नाम तो तेरा माया

शिखरों के पार

हृदय को अकुलाता ये विचार है, दृष्टि को रोके जो ये पहाड़ है, बसता क्या शिखरों के उस पार है। उठती अब तल से चीख पुकार है, करती जो अंतः में चिंघाड़ है, छुपा क्या शिखरों के उस पार है। हृदय को नहीं ये स्वीकार है, क्यों यहाँ बंधा तेरा संसार है , जाने क्या शिखरों के उस पार है। तोड़ो, रोकती जो तुमको दीवार है, भू पर धरोहर का अंबार है, देखो क्या शिखरों के उस पार है।। #Inspiration #hindi #Blog #HindiPoetry #motivation #writings #Reflections #poetry #France #Thoughts #Annecy #Writing

शब्दों का हठ

कहते हैं मुझसे कि एक बच्चे की है स्वप्न से बनना, जो पक्षियों के पैरों में छुपकर घोंसले बना लेते हैं। कहते हैं मुझसे कि एक थिरकती लौ की आस सा बनना, जो उजड़ती साँसों को भी हौसला देकर जगा देते हैं। कविताओं के छंद बना जब पतंग सा मैंने उड़ाना चाहा, तो इनमें से कुछ आप ही बिखर गए धागे से खुलकर। पद्य के रस में पीस कर जब इत्र से मैंने फैलाना चाहा, तो इनमें से कुछ स्वयं ही लुप्त हुए बादल में घुलकर। अब उन्हें न ही किसी श्लोक न किसी आयत में बंद होना है, अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की परिभाषा

अरण्य का फूल

बेलों लताओं और डालियों पर सजते हैं कितने, रूप रंग सुरभि से शोभित कोमल हैं ये उतने। असंख्य खिलते हैं यहाँ और असंख्य मुरझाते हैं, अज्ञात और अविदित कितने धूल में मिल जाते हैं। दो दिन की ख्याति है कुछ की दो दिन पूजे जाते, फिर कोई न पूछे उन्हें जो वक्ष पर मुरझा जाते। जग रमता उसी को है जो फल का रूप है धरता, अरण्य का वो फूल मूल जो पेट किसी का भरता।। #random #Inspiration #hindi #HindiPoetry #Poems #writings #Reflections #poetry #Thoughts #Writing

काव्य नहीं बंधते

शब्द तो गट्ठर में कितने बांध रखे हैं, स्याही में घुल कलम से वो अब नहीं बहते। हो तरंगित कागज़ों को वो नहीं रंगते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। बीज तो माटी में निज विलीन होते हैं, किन्तु उनसे लय के अब अंकुर नहीं खिलते। मनस की बेलों पर नव सुमन नहीं सजते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। मैं पुराने ऊन को फिर उधेड़ बिनती हूँ, पर हठी ये गाँठ हाथों से नहीं खुलते। उलझ खुद में वो नए ढांचे नहीं ढलते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। अंतः में अटखेलियाँ तो भा

कल्पना की दुनिया

यथार्थ की परत के परोक्ष में, कल्पना की ओट के तले, एक अनोखी सी दुनिया प्रेरित, अबाध्य है पले। चेतन बोध से युक्त सृजन के सूत्रधारों की, अनुपम रचनाओं और उनके रचनाकारों की। सृजन फलता है वहाँ विचारों के आधार पर। उत्पत्तियाँ होतीं हैं भावना की ललकार पर। सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ ह्रदय को निचोड़ने मात्र से, हर तृष्णा सदृश हो जाती है अंतः के अतल पात्र से। इसके उर में जीते वो जीव रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं। कभी उद्वेग से भर कर एक आंदोलन छेड़ जाते हैं। कल्पना के उस पार जाने का, यथ

पतझड़

कल्पना करो, कुछ दिनों में ये बंजर हो जायेंगे। ये हवा के संग लहलहाते पत्ते, अतीत में खो जायेंगे॥ जब बारिश की बूंदों में ये पत्ते विलीन होंगे। क्या अश्रु में लिप्त तब ये कुलीन होंगे? विरह की ज्वाला में क्या ये पेड़ भी स्वतः जलेंगे? या नवजीवन की प्रतीक्षा में यूँही अटल रहेंगे? क्या हवा के थपेड़ों में झुक कर, टूट मरेंगे? या चिड़ियों के घोंसलों का फिर ये आशियाँ बनेंगे? शायद, यूँहीं, सभ्यताओं का अंत होता है। या शायद,आरम्भ ही इस अंत के परांत होता है॥ #HindiPoetry #Poems #Reflections #ह

बढ़ चलें हैं कदम फिर से

छोड़ कर वो घर पुराना, ढूंढें न कोई ठिकाना, बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना। ऊंचाई कहाँ हैं जानते, मंज़िल नहीं हैं मानते। डर जो कभी रोके इन्हें उत्साह का कर हैं थामते। कौतुहल की डोर पर जीवन के पथ को है बढ़ाना। बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना।। काँधे पर बस्ता हैं डाले, दिल में रिश्तों को है पाले। थक चुके हैं, पक चुके हैं, फिर भी पग-पग हैं संभाले। खुशियों की है खोज कि यात्रा तो बस अब है बहाना। बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना।। जो पुरानी सभ्यता है छोड़ कर पीछे

सैंतीस केजी सामान

फोटो सौजन्य: मृणाल शाह छितराई यादों से अब मैं सैंतिस केजी छाँटूं कैसे? सात साल के जीवन को एक बक्से में बाँधूँ कैसे? बाँध भी लूँ मैं नर्म रजाई और तकिये को एक ही संग और लगा कर तह चादर को रख दूँ उनको एक ही ढंग बिस्तर की सिलवट से पर मैं सपनों को छाँटूँ कैसे? सात साल के जीवन को एक बक्से में बाँधूँ कैसे? ढेर किताबों की दे दूँ मैं किसी कनिष्ठ के घर पर भी बेच मैं दूँ पुस्तिकाऐं अपनी व्यर्थ सारी समझ कर भी पर ज्ञान के रस को अब मैं पन्नों से छानूँ कैसे? सात साल के जीवन को एक बक्से में ब

Plastic deformation

Courtesy: My birthday gift from a few dear friends Yesterday, while walking, I wrote some words in ink. Some were bitter, harsh Some rosy, lovely, pink. Some warm and touching, I poured from my heart. Some reckless, careless, Roughly scribbled, apart. Some truth laden emotions, Carefully weaved together. Some shallow, unsettling, Bound with a tether. I sprayed my raw ideas. Brewed them to unwind. I laid some soft musings Of a wandering mind. I also sketched in ink the faces t

कविता की चोरी

शब्दों को कर के लय-बद्ध, लिखे मैंने वो चंद पद्य, मन की इच्छा के भाव थे वो, मेरे अंतर्मन का रिसाव थे वो, वो मेरी कहानी कहते थे, मेरे निकट सदा ही रहते थे, वो प्रेम सुधा बरसाते थे, मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥ भाव-विभोरित करता रूप, हर पंक्ति थी करुणा स्वरुप, थे बिम्ब वो मेरी दृष्टि के, मुझे सर्वप्रिय वो सृष्टि में, मेरे सृजन की अनुपम प्रतिमा थे, वो मान की मेरे गरिमा थे, वो मेरी गाथा गाते थे, मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥ पर बक्से से एक अवगत वो, रहे दूर सदा ही जगत से वो, निंदा का

करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन

पृष्ठभूमि : अभिमन्यु चक्रव्यूह के आखिरी चरण में हैं। वे खुद को ये समझा रहे हैं कि अंतिम चरण की लड़ाई कैसे उनके कौशल पर निर्भर करती है । खुद को समझाने की इस क्रिया में वे चक्रव्यूह में प्रवेश करने के निर्णय से लेकर अंतिम चरण तक पहुँचने की कहानी को स्मरण करते हैं । कर चुका कई वीरों का दमन और प्रविष्ट हुआ मैं अंतिम चरण अब करूँ मैं वो आरम्भ स्मरण लिया निर्णय मैंने जिस क्षण ‘अब आये राह में कोई अड़चन करूँगा मैं ही ये व्यूह-खंडन’। ‘कुरुक्षेत्र में था चक्रव्यूह सजा कौरवों ने क्या षड़यंत

हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए

है जंग यहाँ फिर आज छिड़ी है रण भूमि फिर आज सजी अर्जुन ने अपना धनुष कसा तरकश को फिर बाणों से भरा इस बार भी भाई समक्ष खड़े अर्जुन के बाण प्रत्यक्ष अड़े अस्थिर मन फिर से सवाल करे “अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए?” अर्जुन का पराक्रम है प्रबल बाणों का शौर्य हुआ न कम ‘पर भाई से कैसे करें ये रण?’ व्यग्र-अशांत है अब भी मन ‘मन को वश में अब कैसे करें? कर्म पर ही चित कैसे धरें?’ नैतिकता विचार विमूढ़ किये अरे हाय! कृष्ण तुम कहाँ गए? व्याकुल अर्जुन, आह्वान किये हर चर-अचर से एक मांग किये “अरे ढूंढो

यहाँ सब चलता है

यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। श्वेत जामा ओढ़े है विनाश, भू बिछी है निर्दोषों की लाश, अश्रु-क्रंदन में बहे उल्लास, ढेर हुआ बेबस विश्वास, न्याय बना मूरत है कबसे मना रहा अवकाश, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। सूख रहा निर्झर का पानी मलिन है हाय! निरीह जवानी तोड़ते हैं सब रीढ़ शरों के रिसता है बस लहू करों से हर क्षण हर पल बिखर रही है व्याकुल उर की हर आस, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। क्षुद्र क्लेश, है बंटता देश पुरखों का खंडित अवशेष उड़ गयी चिड़िया स्वर्ण पंख

आलिंगन

अधखुली तेरी आँखों में लिखे थे अधूरे शब्द स्वयं को बांधे हुए थी मैं संकुचित, निस्तब्ध। तरंगों की आंधी में खिंच रहे थे अधीर मन भावों के भंवर से घिरे थे, हम आत्म-संलग्न। पवन-बयार संग थी जगमग चांदनी मद्धम साँसों की लय पर थिरकती वाहिनी थम-थम। उँगलियों की नर्मी से थे अभिभूत दो ह्रदय डोलते क़दमों से छिड़ा निर्बाध प्रेम-विषय। हर क्षण ने जोड़ा था ईंट झिझक के उस पार होठों का वो स्पर्श और उसमें मिश्रित प्यार। स्नेहिल भावों में हुआ था लुप्त ये संसार प्रेमालिंगन से सुलझा, उलझा हर विचार। बीत

करूँ मैं किसकी आस?

दोषयुक्त है बगिया सारी विष का हुआ है वास सोच रहे हैं भँवरे सारे करूँ मैं किसकी आस? छोड़ गए परिजन हैं सारे ना ज्योत, ना विलास सोच रहे हैं वृद्धा सारे करूँ मैं किसकी आस? है विरक्त सशक्त समाज और करे ना कोई प्रयास सोच रहे हैं दुर्बल सारे करूँ मैं किसकी आस? सियासतों की लगती बाज़ी क्षतिग्रस्त विश्वास सोच रही है जनता सारी करूँ मैं किसकी आस? कंस मंथरा शकुनि बने सब लूट रहे हस्तिनापुर गोकुल जल रहा अयोध्या का आँचल मथुरा में भी है त्रास सोच रही है प्रजा बेचारी करूँ मैं किसकी आस? आस विलास व

ऊंची नाक वाले अंकल

कल शाम मिले मुझे एक अंकल बहुत ही ऊंची नाक थी उनकी। कपडे थोड़े फटे हुए थे तनी हुई पर शाख थी उनकी॥ जब जहां जब भी वो जाते पहले उनकी नाक पहुँचती। सबसे जग में यही बताते सबसे ऊंची नाक है उनकी॥ कभी जो दिल उनका कुछ चाहे पहले वो अपनी नाक से मापें। नाक की कद से जो ऊंचा हो उसे ही अपने योग्य वो समझे॥ देखते वो पहचान में आये किया ‘नमस्ते’ सर को झुकाए। असमंजस में लगे ज़रा वो ध्यान कहीं और कहीं को जायें॥ टकटकी लगाये देखते थे वो वहाँ झूलते हुए झूलों को। तोड़ रहे थे साथ-साथ वो पूजा के लिए फूलों क

आत्म-मंथन

द्वंद्व छिड़ी हुई है मन में किस पथ को अपनाऊँ मैं। सब कहते हैं वो अपने हैं किसके संग हो जाऊं मैं? हर राह लगती है सूनी हर पथिक लगता है भटका, पूछूं किससे राह मैं अपनी सपना जो पूरा हो मन का। सही-गलत के जटिल प्रश्न में उलझा बैठा है मेरा मन, किस राह को मैं अपनाकर कर दूं उसे ये जीवन अर्पण। आज नहीं कर पाती निश्चय किस पथ पर बढ़ जाऊं मैं? द्वंद्व छिड़ी हुई है मन में किस पथ को अपनाऊं मैं॥ हर श्वास कहती है मुझसे समय भी मेरे पास नहीं है, दुविधा बड़ी है और लगता है भाग्य भी अपने साथ नहीं है।