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दीवारें

माना कि थे वो ग़लत और क्रूर अपरम्पार थे । दोषों से वो युक्त थे और पाप के भरमार थे ।। किन्तु दीवारें बना, क्या हमने हत्याएं न कीं? जो हमारे कर हुई, वो न्याय कैसे कब हुईं? क्या दीवारें बनने से आयी कभी कहीं शांति है? भूत के पन्ने पलट लो, इनसे हुई बस क्रांति है! #HindiPoetry #BerlinWall #Poems #FallofBerlinWall #Randomthoughts #Thoughts #Berlin #Germany #Writing

It lived for a day

He groomed it with wonders of love and spades, It bloomed, it flowered with yellow as shades. It was loved, it flourished It glowed, it was cherished. It passed, it swayed, from hand to hand Flaunting its beauty, with whispers of demand. And now, fractured, it lies, in a corner Spine fragmented and no beauty armour. Ephemeral was fragrance, scattered is softness Breathing the last, aloof and thoughtless It wilted in water, unuttered, astray It bloomed, it flourished, it lived

भूल जाओ मुझे

भूल जाओ मुझे, क्यूँ मेरे लाश को बार बार जगाते हो? क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो? मेरे साथ ही तो उस सभ्यता का अंत हो गया था फिर क्यूँ उन कहानियों को तुम हर बार दोहराते हो? क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो? भूल जाओ मुझे, मैं बस एक अतीत का टुकड़ा ही तो हूँ जिससे भाग्य रूठा था वो एक मुखड़ा ही तो हूँ फिर क्यूँ मेरे स्वामित्व का स्वांग लगाते हो? क्यूँ मेरे अंत पर तुम प्रश्न चिन्ह लगाते हो? भूल जाओ मुझे, चमकता हुआ मेरा वो चरम डूब चूका है प्रसिद्धि का हर राग मु

मारीच की खोज

मैं धरा के जंगलों में ढूंढता मारीच, देखो ! बिछड़े लक्ष्मण और सीता मुझसे किस युग में, न पूछो ! एक उसकी खोज में वर्षों गए हैं बीत मेरे। अब उपासक बन गए हैं उसके ही सब गीत मेरे। मृग बना था स्वर्ण का वह, किसी युग में ज्ञात मुझको। अब तो अनभिज्ञ सा मैं ढूंढता हर पात उसको। मन है उसका बंधक कि मोहन में है जीवन बिताये। किन्तु न अस्तित्व उसका किसी भी क्षण में जान पाए। कौन है वह, क्या है कि वह समक्ष भी है परोक्ष भी है। पाने से उसको ही, अब तो तय हुआ मेरा मोक्ष भी है। वन गगन और पर्वतों पर, ह

शिखरों के पार

हृदय को अकुलाता ये विचार है, दृष्टि को रोके जो ये पहाड़ है, बसता क्या शिखरों के उस पार है। उठती अब तल से चीख पुकार है, करती जो अंतः में चिंघाड़ है, छुपा क्या शिखरों के उस पार है। हृदय को नहीं ये स्वीकार है, क्यों यहाँ बंधा तेरा संसार है , जाने क्या शिखरों के उस पार है। तोड़ो, रोकती जो तुमको दीवार है, भू पर धरोहर का अंबार है, देखो क्या शिखरों के उस पार है।। #Inspiration #hindi #Blog #HindiPoetry #motivation #writings #Reflections #poetry #France #Thoughts #Annecy #Writing

शब्दों का हठ

कहते हैं मुझसे कि एक बच्चे की है स्वप्न से बनना, जो पक्षियों के पैरों में छुपकर घोंसले बना लेते हैं। कहते हैं मुझसे कि एक थिरकती लौ की आस सा बनना, जो उजड़ती साँसों को भी हौसला देकर जगा देते हैं। कविताओं के छंद बना जब पतंग सा मैंने उड़ाना चाहा, तो इनमें से कुछ आप ही बिखर गए धागे से खुलकर। पद्य के रस में पीस कर जब इत्र से मैंने फैलाना चाहा, तो इनमें से कुछ स्वयं ही लुप्त हुए बादल में घुलकर। अब उन्हें न ही किसी श्लोक न किसी आयत में बंद होना है, अब उन्हें अपनी उपयुक्तता की परिभाषा

अरण्य का फूल

बेलों लताओं और डालियों पर सजते हैं कितने, रूप रंग सुरभि से शोभित कोमल हैं ये उतने। असंख्य खिलते हैं यहाँ और असंख्य मुरझाते हैं, अज्ञात और अविदित कितने धूल में मिल जाते हैं। दो दिन की ख्याति है कुछ की दो दिन पूजे जाते, फिर कोई न पूछे उन्हें जो वक्ष पर मुरझा जाते। जग रमता उसी को है जो फल का रूप है धरता, अरण्य का वो फूल मूल जो पेट किसी का भरता।। #random #Inspiration #hindi #HindiPoetry #Poems #writings #Reflections #poetry #Thoughts #Writing

काव्य नहीं बंधते

शब्द तो गट्ठर में कितने बांध रखे हैं, स्याही में घुल कलम से वो अब नहीं बहते। हो तरंगित कागज़ों को वो नहीं रंगते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। बीज तो माटी में निज विलीन होते हैं, किन्तु उनसे लय के अब अंकुर नहीं खिलते। मनस की बेलों पर नव सुमन नहीं सजते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। मैं पुराने ऊन को फिर उधेड़ बिनती हूँ, पर हठी ये गाँठ हाथों से नहीं खुलते। उलझ खुद में वो नए ढांचे नहीं ढलते, जाने क्यों मुझसे अब अच्छे छंद नहीं रचते।। अंतः में अटखेलियाँ तो भा

कल्पना की दुनिया

यथार्थ की परत के परोक्ष में, कल्पना की ओट के तले, एक अनोखी सी दुनिया प्रेरित, अबाध्य है पले। चेतन बोध से युक्त सृजन के सूत्रधारों की, अनुपम रचनाओं और उनके रचनाकारों की। सृजन फलता है वहाँ विचारों के आधार पर। उत्पत्तियाँ होतीं हैं भावना की ललकार पर। सजीव हो उठती हैं आकृतियाँ ह्रदय को निचोड़ने मात्र से, हर तृष्णा सदृश हो जाती है अंतः के अतल पात्र से। इसके उर में जीते वो जीव रेंगते रेंगते कभी खड़े हो जाते हैं। कभी उद्वेग से भर कर एक आंदोलन छेड़ जाते हैं। कल्पना के उस पार जाने का, यथ

पत्तों की बरसात

आँख खुली तो देखा मैंने, रात अजब एक बात हुई थी । अंगड़ाई लेती थी सुबह औंधी गहरी रात हुई थी ॥ पक्षी भी सारे अब चुप थे, घोंसलों में बैठे गुमसुम थे, कैसी ये घटना उनके संग यूँही अकस्मात् हुई थी । आँख खुली तो देखा मैंने, रात अजब एक बात हुई थी ॥ सूरज की अब धूप भी नम थी, तपिश भी उसमें थोड़ी कम थी, स्थिति बनाती और गहन तब तेज़ हवा भी साथ हुई थी । आँख खुली तो देखा मैंने, रात अजब एक बात हुई थी ॥ शर्म छोड़ सब पेड़ थे नंगे, टेढ़े मेढ़े और बेढंगे, झड़प हुई थी उनमें या कि पत्तों की बरसात हुई थी । आ

पतझड़

कल्पना करो, कुछ दिनों में ये बंजर हो जायेंगे। ये हवा के संग लहलहाते पत्ते, अतीत में खो जायेंगे॥ जब बारिश की बूंदों में ये पत्ते विलीन होंगे। क्या अश्रु में लिप्त तब ये कुलीन होंगे? विरह की ज्वाला में क्या ये पेड़ भी स्वतः जलेंगे? या नवजीवन की प्रतीक्षा में यूँही अटल रहेंगे? क्या हवा के थपेड़ों में झुक कर, टूट मरेंगे? या चिड़ियों के घोंसलों का फिर ये आशियाँ बनेंगे? शायद, यूँहीं, सभ्यताओं का अंत होता है। या शायद,आरम्भ ही इस अंत के परांत होता है॥ #HindiPoetry #Poems #Reflections #ह

बढ़ चलें हैं कदम फिर से

छोड़ कर वो घर पुराना, ढूंढें न कोई ठिकाना, बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना। ऊंचाई कहाँ हैं जानते, मंज़िल नहीं हैं मानते। डर जो कभी रोके इन्हें उत्साह का कर हैं थामते। कौतुहल की डोर पर जीवन के पथ को है बढ़ाना। बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना।। काँधे पर बस्ता हैं डाले, दिल में रिश्तों को है पाले। थक चुके हैं, पक चुके हैं, फिर भी पग-पग हैं संभाले। खुशियों की है खोज कि यात्रा तो बस अब है बहाना। बढ़ चलें हैं कदम फिर से छोड़ अपना आशियाना।। जो पुरानी सभ्यता है छोड़ कर पीछे

सैंतीस केजी सामान

फोटो सौजन्य: मृणाल शाह छितराई यादों से अब मैं सैंतिस केजी छाँटूं कैसे? सात साल के जीवन को एक बक्से में बाँधूँ कैसे? बाँध भी लूँ मैं नर्म रजाई और तकिये को एक ही संग और लगा कर तह चादर को रख दूँ उनको एक ही ढंग बिस्तर की सिलवट से पर मैं सपनों को छाँटूँ कैसे? सात साल के जीवन को एक बक्से में बाँधूँ कैसे? ढेर किताबों की दे दूँ मैं किसी कनिष्ठ के घर पर भी बेच मैं दूँ पुस्तिकाऐं अपनी व्यर्थ सारी समझ कर भी पर ज्ञान के रस को अब मैं पन्नों से छानूँ कैसे? सात साल के जीवन को एक बक्से में ब

Plastic deformation

Courtesy: My birthday gift from a few dear friends Yesterday, while walking, I wrote some words in ink. Some were bitter, harsh Some rosy, lovely, pink. Some warm and touching, I poured from my heart. Some reckless, careless, Roughly scribbled, apart. Some truth laden emotions, Carefully weaved together. Some shallow, unsettling, Bound with a tether. I sprayed my raw ideas. Brewed them to unwind. I laid some soft musings Of a wandering mind. I also sketched in ink the faces t

मैं आस की चादर बुनती थी

चित्र श्रेय: गूगल इमेजेस जब चाँद छुपा था बादल में, था लिप्त गगन के आँगन में, मैं रात की चादर को ओढ़े तारों से बातें करती थी । मैं नभ के झिलमिल प्रांगण से सपनों के मोती चुनती थी । मैं आस की चादर बुनती थी ॥ जब सूर्य किरण से रूठा था, प्रकाश का बल भी टूटा था, मैं सूर्य-किरण के क्षमता की गाथायें गाया करती थी । धागों के बाती बना-बना जग का अँधियारा हरती थी । मैं आस की चादर बुनती थी ॥ जब हरियाली मुरझाई थी, शुष्कता उनपर छायी थी, मैं भंगूरित उन मूलों को पानी से सींचा करती थी । पेडों की

That silent guitar

Silently, it lays. Strings out of tune. Nothing brings life, Neither sun, nor moon. Skin has lost luster, Lies yellow and pale Crawlers adorn the gaps leaving tiny trails. Discordant, it lays. Its melody is gone. Yet the string’s might wait for the dawn. Silence is relentless. This wait is endless. For touch of those fingers, for warmth of that caress. Dusted and dying , Lay music inside. With broken hopes, it laid, when last night it cried. #music #poem #guitar #introspectio

कविता की चोरी

शब्दों को कर के लय-बद्ध, लिखे मैंने वो चंद पद्य, मन की इच्छा के भाव थे वो, मेरे अंतर्मन का रिसाव थे वो, वो मेरी कहानी कहते थे, मेरे निकट सदा ही रहते थे, वो प्रेम सुधा बरसाते थे, मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥ भाव-विभोरित करता रूप, हर पंक्ति थी करुणा स्वरुप, थे बिम्ब वो मेरी दृष्टि के, मुझे सर्वप्रिय वो सृष्टि में, मेरे सृजन की अनुपम प्रतिमा थे, वो मान की मेरे गरिमा थे, वो मेरी गाथा गाते थे, मेरे दिल को वो बड़ा भाते थे ॥ पर बक्से से एक अवगत वो, रहे दूर सदा ही जगत से वो, निंदा का

मनोव्यथा

क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है? क्यूं नियति से बदलियाँ छटती नहीं हैं? हर दिशा झुलसी है अग्नि के प्रलय से क्यूं धरा पर कोपलें खिलती नहीं हैं? जब भी बढ़ के छूना चाहूँ मैं हवा को हाथ एक कालिख में रंग के लौट आते, जब भी कर में बूंदों को मैं भरना चाहूँ विष के प्याले उँगलियों पर छलक जाते। प्यासे होठों पर कलि खिलती नहीं हैं क्यूं सूर्य की धूप अब घटती नहीं है? ना कहीं मुस्कान है ना आस दिखती हर तरफ आंधी की गहरी श्वास चलती, प्रकृति के रस को पल-पल हम निगलते हर घूँट में आंसुओं की धार ब

आत्म-मंथन

द्वंद्व छिड़ी हुई है मन में किस पथ को अपनाऊँ मैं। सब कहते हैं वो अपने हैं किसके संग हो जाऊं मैं? हर राह लगती है सूनी हर पथिक लगता है भटका, पूछूं किससे राह मैं अपनी सपना जो पूरा हो मन का। सही-गलत के जटिल प्रश्न में उलझा बैठा है मेरा मन, किस राह को मैं अपनाकर कर दूं उसे ये जीवन अर्पण। आज नहीं कर पाती निश्चय किस पथ पर बढ़ जाऊं मैं? द्वंद्व छिड़ी हुई है मन में किस पथ को अपनाऊं मैं॥ हर श्वास कहती है मुझसे समय भी मेरे पास नहीं है, दुविधा बड़ी है और लगता है भाग्य भी अपने साथ नहीं है।

तुम्हारा लैबकोट

तुम्हारा लैबकोट मिला एक दिन तुम्हारी कुर्सी पर लटका हुआ खोया- खोया मायूस सा, चेहरा बिलकुल उतरा हुआ। किसी ने सुबह से उसका हाल ना पूछा था किसी ने उसकी तरफ मुड़ के भी तो ना देखा था। डूबा हुआ था वो तुम्हारी छितराई यादों में ‘क्यूँ छोड़ गया मुझे वो?’ यही सवाल था उसकी फरियादों में। जब मैंने उसके कंधे पर से जमी धुल हटाई उसकी उदास आँखें आंसुओं से भर आयीं। डबडबाई आँखों से फिर उसने मेरी ओर देखा झुकी हुई पलकों पर खिंची था आशा की एक रेखा। ‘देखा है कई बार मैंने तुम्हे यहाँ आते-जाते कहाँ

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