यहाँ सब चलता है

यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। श्वेत जामा ओढ़े है विनाश, भू बिछी है निर्दोषों की लाश, अश्रु-क्रंदन में बहे उल्लास, ढेर हुआ बेबस विश्वास, न्याय बना मूरत है कबसे मना रहा अवकाश, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। सूख रहा निर्झर का पानी मलिन है हाय! निरीह जवानी तोड़ते हैं सब रीढ़ शरों के रिसता है बस लहू करों से हर क्षण हर पल बिखर रही है व्याकुल उर की हर आस, मगर सब चलता है। यहाँ कहते हैं कि सब चलता है। क्षुद्र क्लेश, है बंटता देश पुरखों का खंडित अवशेष उड़ गयी चिड़िया स्वर्ण पंख

उठ जाग ! ऐ भारतीय !

Photo Courtesy Pratik Agarwal उत्तेजना संदेह से कुंठित हैं मनोभाव मिलती नही इस धूप से अब कहीं भी छाँव। हर अंग पर चिन्हित हुआ है भ्रष्ट का सवाल आता नहीं है मन में कोई अब दूसरा ख्याल॥ नीतियों में है कहीं फंसा वो राष्ट्रवाद विकास को रोके हुए, हर ओर का विवाद। ओढ़े हुए हैं मैली कुचली संस्कृति फटी आत्मदाह में जल रही किसानों की ये मिट्टी॥ धर्म की निरपेक्षता के नारे लगाते हम घर में ही अपने जाति पर लाशें बिछाते हम। उलझे हुए हैं चमडों के रंगों में वर्षों से कहने को तो सब हैं एक पर भिन्न